इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया है कि प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं को वास्तविक न्याय पर वरीयता नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मृत व्यक्ति को सद्भावनापूर्ण भूल के कारण वाद में पक्षकार बना दिया गया हो, तो उसके विधिक उत्तराधिकारियों को अभिलेख पर लाकर उस त्रुटि का परिमार्जन किए जाने पर कार्यवाही शून्य नहीं हो जाती।

माननीय न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 227 के अंतर्गत दायर याचिका को निरस्त करते हुए पारित किया। उक्त याचिका उत्तर प्रदेश शहरी परिसरों की किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 4(3) के अंतर्गत किराया प्राधिकरण एवं किराया अधिकरण द्वारा पारित आदेशों को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थी।

विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब मकान-मालिकों द्वारा एक ऐसे किरायेदार के विरुद्ध किराया वाद संस्थित किया गया, जिसकी वाद संस्थापन से पूर्व ही मृत्यु हो चुकी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया कि चूंकि कार्यवाही एक मृत व्यक्ति के विरुद्ध प्रारंभ की गई थी, अतः उसके विधिक उत्तराधिकारियों को केवल पक्षकार के रूप में सम्मिलित किया जा सकता था, न कि प्रतिस्थापन के माध्यम से, और इस कारण संपूर्ण कार्यवाही दोषपूर्ण हो गई।

इसके विपरीत, मकान-मालिकों की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि मृत किरायेदार को सद्भावनापूर्ण भ्रांति के कारण पक्षकार बनाया गया था तथा उसकी मृत्यु की जानकारी प्राप्त होने पर तत्क्षण उसके विधिक उत्तराधिकारियों को अभिलेख पर लाने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया। यह भी तर्क दिया गया कि अन्य संयुक्त किरायेदार पहले से ही कार्यवाही में पक्षकार थे तथा किसी प्रकार की क्षति या पूर्वाग्रह उत्पन्न नहीं हुआ।

उच्च न्यायालय ने अवलोकन किया कि प्रक्रियात्मक विधि का उद्देश्य न्याय की उन्नति करना है, न कि वास्तविक अधिकारों को विफल करना। “प्रक्रिया न्याय की सहायक है” सिद्धांत पर बल देते हुए न्यायालय ने कहा कि आवेदन के नामकरण से संबंधित अत्यधिक तकनीकी आपत्तियां उस स्थिति में कार्यवाही को अमान्य नहीं कर सकतीं, जब आवश्यक पक्षकार सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित हों।

न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि किसी मृत व्यक्ति का वाद में सम्मिलन, जिसे बाद में विधिक उत्तराधिकारियों को अभिलेख पर लाकर सुधार लिया गया हो, मात्र इसी आधार पर कार्यवाही को शून्य नहीं बनाता, विशेषतः तब जबकि अन्य संयुक्त किरायेदार पहले से न्यायालय के समक्ष उपस्थित हों और किसी प्रकार का पूर्वाग्रह सिद्ध न हो।

विवादित आदेशों में किसी प्रकार की प्रत्यक्ष अवैधता, विकृति अथवा अधिकारिता संबंधी त्रुटि न पाते हुए उच्च न्यायालय ने याचिका निरस्त कर दी तथा विधिक उत्तराधिकारियों के प्रतिस्थापन को वैध ठहराया।

यह निर्णय इस विधिक सिद्धांत को पुनः सुदृढ़ करता है कि सुधार योग्य प्रक्रियात्मक त्रुटियां किराया एवं किरायेदारी विवादों में गुण-दोष के आधार पर न्यायिक निर्णय में बाधक नहीं बन सकतीं।

वाद विवरण:
वाद संख्या: अनुच्छेद 227 के अंतर्गत मामले 2026 का 2014
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
याचिकाकर्ता: कुश सहगल एवं 2 अन्य
प्रतिवादी: गौरव शुक्ला एवं अन्य

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